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कविता

हमारे समय के पेड़

नवनीत पांडे


हमारे जंगल में
बहुत से ऐसे पेड़ हैं
जो पेड़ हैं
पर नहीं दिखता
कहीं भी पेड़पन उन में
किसी भी दिशा से
कैसी भी चले हवाएँ
वे न हिलते हैं
न हिलाते हैं

फूल-फल आए तो
बरसों हुए
छाँव भी
चिंदी-चिंदी

उन पर बने घोंसलों के
परिंदों के सच भी
कुछ अलग नहीं हैं

निश्चित हैं
उनकी जीवन-चर्या
किसी भी परिवर्तन
गति से सर्वथा अप्रभावित
किसी भी दिशा-दशा
आपदा, विपदा में
तटस्थ प्रतिक्रियाहीन

भले उजड़ जाएँ
उनके घोंसलें
टूट - काट ली जाएँ
बसेरेवाली शाखाएँ
कोई फर्क नहीं पड़ता
उनकी जमात को
वे हर हाल निश्चिंत
अपने तय आकाश
उड़ने में मस्त रहते हैं

हाँ! सच!
ऐसे पेड़
और परिंदे भी हैं
हमारी आदमियत के
जंगलों में!

आश्चर्य!
इन्हीं को
माने बैठे हैं वे
सबसे बड़े देवता!
इन्हीं की छाँहों में
मृत आस्थाओं के पत्थर
रोपे-पूजे जा रहे हैं
दुराग्रही सोच-विचार
हम पर थोपे जा रहे हैं
और हम सब
चुपचाप! ये खाप!
सहमत भेड़ हुए
तालियाँ पीटे जा रहे हैं!


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